सोमवार को एक संसदीय समिति ने यूपीए सरकार के दौरान लागू हुए महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के विभिन्न पहलुओं की समीक्षा की। समिति ने इस बात पर चर्चा की कि मोदी सरकार द्वारा अधिनियम के जरिये लाए गए विकसित भारत–रोजगार और आजीविका मिशन गारंटी (ग्रामीण) यानी वीबी–जी राम जी अधिनियम में सुचारू रूप से परिवर्तन कैसे किया जाए।
पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रामीण विकास और पंचायती राज संबंधी संसदीय स्थायी समिति के अधिकांश सदस्यों ने इस बात पर चिंता जताई कि अगले छह महीनों में मनरेगा से वीबी–जी राम जी अधिनियम में नीतियों और प्रक्रियाओं का स्थानांतरण किस तरह होगा। सदस्यों ने यह सवाल भी उठाया कि इस संक्रमण काल में लाभार्थियों को भुगतान कैसे किया जाएगा और अतिरिक्त बजटीय सहायता की व्यवस्था किस प्रकार होगी।
नए कानून के विरोध में कोई नहीं, लेकिन लागू करने को लेकर चिंता
सूत्रों के अनुसार, बैठक के दौरान किसी भी सदस्य ने वीबी–जी राम जी अधिनियम का विरोध नहीं किया। हालांकि, कई सदस्यों ने यह मुद्दा उठाया कि पुराने कानून के तहत कई राज्यों में नामांकन दर केवल लगभग 50 प्रतिशत ही रही थी। इसके अलावा, यह भी कहा गया कि नए अधिनियम को पूरी तरह लागू करने में कम से कम छह महीने लगेंगे, क्योंकि इसके नियम तैयार होने के बाद ही इसे जमीन पर लागू किया जा सकेगा।
विपक्ष की मांग— सिफारिशों को किया जाए शामिल
मनरेगा को वर्ष 2005 में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने पारित किया था। वहीं, वीबी–जी राम जी विधेयक को हाल ही में संसद के शीतकालीन सत्र में विपक्ष के कड़े विरोध के बीच पारित किया गया। नए अधिनियम में ग्रामीण श्रमिकों को 125 दिनों के मजदूरी रोजगार का प्रावधान किया गया है।
बैठक में विपक्षी सदस्यों ने यह भी याद दिलाया कि उन्होंने पहले मनरेगा के तहत कार्यदिवसों की संख्या 100 से बढ़ाकर 150 करने का सुझाव दिया था। विपक्ष की मांग है कि वीबी–जी राम जी अधिनियम के नियम बनाते समय समिति द्वारा पहले दी गई सभी सिफारिशों पर गंभीरता से विचार किया जाए, ताकि नई योजना अधिक प्रभावी और लाभकारी बन सके।
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