सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को राष्ट्रपति द्वारा भेजे गए संवैधानिक सवालों पर सुनवाई के आठवें दिन, कर्नाटक सरकार ने स्पष्ट रूप से कहा कि भारत की संवैधानिक व्यवस्था में राष्ट्रपति और राज्यपाल केवल नाममात्र के प्रमुख हैं, और वे मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर काम करने के लिए बाध्य हैं।
कर्नाटक सरकार की ओर से सीनियर एडवोकेट गोपाल सुब्रमण्यम ने चीफ जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ को बताया कि विधानसभा से पारित बिलों पर राज्यपाल की संतुष्टि का अर्थ मंत्रिपरिषद की संतुष्टि ही है।
क्या है मामला?
यह पूरा मामला तमिलनाडु में राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच टकराव से जुड़ा है। राज्यपाल द्वारा विधानसभा से पारित बिलों को लंबे समय तक रोक कर रखने के चलते यह संवैधानिक प्रश्न उठा कि क्या राज्यपाल और राष्ट्रपति इन बिलों पर अनिश्चितकाल तक निर्णय टाल सकते हैं?
सुप्रीम कोर्ट ने 8 अप्रैल को साफ कहा था कि राज्यपाल के पास कोई वीटो पावर नहीं है और राष्ट्रपति को भी राज्यपाल द्वारा भेजे गए बिलों पर 3 महीने के भीतर निर्णय लेना होगा। यह आदेश 11 अप्रैल को सार्वजनिक हुआ था, जिसके बाद राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट से इस विषय पर राय मांगी और 14 सवाल भेजे।
3 सितंबर – बंगाल सरकार का पक्ष:
पश्चिम बंगाल सरकार ने दलील दी कि राज्यपाल को विधानसभा द्वारा पारित बिलों पर तत्काल फैसला लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह बिल जनता की इच्छा का प्रतिनिधित्व करते हैं, और कार्यपालिका को विधायी प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है।
2 सितंबर – तमिलनाडु और बंगाल की याचिका:
दोनों राज्यों ने राष्ट्रपति और राज्यपाल के लिए बिलों पर फैसला लेने की समयसीमा तय करने की मांग की। वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि राष्ट्रपति और राज्यपाल व्यक्तिगत रूप से बिलों पर विचार नहीं करते, बल्कि वे मंत्रिपरिषद की सलाह पर ही कार्य करते हैं।
28 अगस्त – केंद्र सरकार का जवाब:
केंद्र सरकार ने कहा कि राज्य सरकारें राष्ट्रपति या राज्यपाल की कार्रवाई के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दायर नहीं कर सकतीं, क्योंकि संविधान का अनुच्छेद 32 केवल नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए है, न कि राज्य सरकारों के लिए।
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