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    November 21, 2025

    प्रीमेच्योर रिलीज़ मामले में हाईकोर्ट का फैसला, राज्य सरकार को मिला पूर्ण अधिकार

    मद्रास हाईकोर्ट ने कारावास की सजा काट रहे कैदियों की समयपूर्व रिहाई और अंतरिम जमानत को लेकर अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि सजायाफ्ता कैदियों की प्रीमेच्योर रिलीज़ पर फैसला लेने का अधिकार पूरी तरह राज्य सरकार के पास है, और इसे अदालत में अधिकार के रूप में नहीं मांगा जा सकता।

    न्यायमूर्ति एन. सतीश कुमार और न्यायमूर्ति एम. ज्योति रामन की खंडपीठ ने यह टिप्पणी 19 नवंबर को जुबैथा बेगम समेत 13 याचिकाकर्ताओं की याचिकाएं खारिज करते हुए की। इन याचिकाओं में कैदियों को अंतरिम जमानत देने की मांग की गई थी, जबकि उनकी समयपूर्व रिहाई की अर्जी अभी सरकार के पास लंबित थी।

    सजा के बाद कोर्ट की कस्टडी समाप्त: हाईकोर्ट

    अदालत ने कहा कि सजा सुनाए जाने के बाद कैदी कोर्ट की नहीं, बल्कि सरकार और जेल विभाग की कस्टडी में आ जाता है। इसलिए कोर्ट अंतरिम जमानत या अंतरिम छुट्टी का आदेश जारी नहीं कर सकता।
    हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 226 के तहत भी अदालत अंतरिम जमानत देने में हस्तक्षेप नहीं कर सकती, क्योंकि यह न्यायिक अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। इस स्थिति में कैदियों के पास केवल तमिलनाडु सस्पेंशन ऑफ सेंटेंस रूल्स के तहत “सजा निलंबन” का विकल्प ही उपलब्ध रहता है।

    याचिकाकर्ताओं की दलील पर अदालत की सख्त टिप्पणी

    कोर्ट ने कहा कि केवल इसलिए अंतरिम राहत नहीं दी जा सकती कि कैदी की समयपूर्व रिहाई की फाइल सरकार में लंबित है। समयपूर्व रिहाई पर फैसला लेते समय सरकार को कई कारकों पर विचार करना होता है, इसलिए इसे अधिकार समझकर अदालत में मांग करना "न्यायिक रूप से असंगत" है।

    अदालत ने साफ कहा कि सजा पूरी सुनाई जा चुकी हो तो अंतरिम जमानत देने का अधिकार अदालत के पास नहीं है।

    जरूरतमंद मामलों में सरकार सक्रिय हो: कोर्ट

    खंडपीठ ने ‘येसु’ मामले का हवाला देते हुए कहा कि सस्पेंशन ऑफ सेंटेंस रूल्स के नियम 40 के तहत सरकार के पास यह विवेकाधिकार है कि वह किसी भी कैदी को अस्थायी रिहाई दे सकती है। अदालत ने सुझाव दिया कि सरकार जरूरतमंद मामलों में खुद पहल करे, ताकि अदालतों में अनावश्यक याचिकाएं दाखिल न हों।

    ऐसी याचिकाएं अब स्वीकार नहीं होंगी

    हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि जब किसी कैदी की समयपूर्व रिहाई की अर्जी सरकार के पास लंबित हो, तब अंतरिम जमानत, अंतरिम छुट्टी या उसकी अवधि बढ़ाने संबंधी याचिकाएं हाईकोर्ट में स्वीकार नहीं की जाएंगी। इस आदेश के साथ अदालत ने भविष्य में ऐसी याचिकाओं पर रोक लगा दी है।

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