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    October 04, 2025

    नशा मुक्त भारत मिशन को मिला न्यायिक समर्थन, इलाज पर जोर

    बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद बेंच ने शराब और नशे की लत को मानसिक बीमारी बताया। समाज की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने कहा कि नशे के कारण गिरफ्तार व्यक्तियों का मानसिक उपचार और पुनर्वास होना चाहिए।

    अवैध शराब की आसानी से उपलब्धता पर कोर्ट ने जताई चिंता
    हाईकोर्ट ने यह आदेश पिछले हफ्ते सुनवाई के दौरान दिया, जब एक व्यक्ति की जमानत याचिका पर विचार किया जा रहा था। व्यक्ति को अपनी पत्नी के कथित उत्पीड़न और हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। जस्टिस संजय देशमुख की बेंच ने निषेध के बावजूद अवैध शराब और नशील दवाओं की आसानी से उपलब्धता पर चिंता जताई। बेंच ने कहा कि देश की नई युवा पीढ़ी को पड़ोसी देश की ओर से प्रतिबंधित नशीली दवाएं प्रदान की जा रही हैं। यह हमारे देश के खिलाफ युद्ध का एक हिस्सा है।

    अधिकारियों और जिला अदालतों को दिया निर्देश
    बेंच ने निर्देश दिया कि संबंधित अधिकारी और जिला अदालतें मानसिक रूप से बीमार आरोपियों के उपचार मानसिक स्वास्थ्य कानून, 2017 के प्रावधानों का कड़ाई से पालन करें, जब तक वे पूरी तरह ठीक न हो जाएं। कोर्ट ने कहा, अगर जेल पुलिस, जेल अधिकारी और अदालतें इस प्रक्रिया का पालन करेंगी, तो अपराध कम होंगे और समाज को ऐसे लोगों की कानूनी समस्याओं से राहत मिलेगी। इससे सजा के सुधारात्मक सिद्धांत को भी पूरा किया जा सकेगा, जैसे कि अपराध शास्त्र और दंड शास्त्र में बताया गया है।

    उपचार और पुनर्वास समाज की सुरक्षा के लिए जरूरी
    कोर्ट ने आरोपी प्रमोद धुले की जमानत याचिका पर सुनवाई के बाद यह फैसला दिया। धुले को शराब की लत के कारण सीआरपीएफ से निकाला गया था। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मानसिक रूप से बीमार लोगों को बिना उपचार के जमानत देना सही नहीं होगा, क्योंकि वह फिर से गैरकानूनी काम कर सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि ऐसे लोगों का इलाज और पुनर्वास करना समाज की सुरक्षा के लिए जरूरी है। आरोपी ने बाद में अपनी जमानत याचिका वापस ले ली, जिसके बाद कोर्ट ने नांदेड़ जेल अधिकारियों को आदेश दिया कि उसे जिला अस्पताल में मानसिक जांच और उपचार के लिए ले जाया जाए। अगर वह शराब की लत की वजह से मानसिक रूप से बीमार पाया जाता है, तो उसे पूरी तरह ठीक होने तक पुनर्वास केंद्र में रखा जाए।

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