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    November 15, 2025

    कमजोर संगठन और गलत टिकट चयन से कांग्रेस की बड़ी गिरावट

    बिहार में चुनाव की तारीखें नजदीक आने के साथ ही कांग्रेस के कई नेताओं को अंदाजा हो गया था कि पार्टी का प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहने वाला। लेकिन नतीजों में जिस तरह पार्टी औंधे मुंह गिरी, उसकी कल्पना वरिष्ठ नेताओं ने भी नहीं की थी। करारी हार के बाद कांग्रेस नेताओं का मानना है कि कमजोर संगठन, गलत टिकट वितरण, रणनीति की कमी और गठबंधन में तालमेल का अभाव—इन सभी ने पार्टी को गहरे संकट में धकेल दिया।

    पार्टी नेताओं का कहना है कि वोट चोरी के आरोपों को बढ़ा-चढ़ाकर उठाना, दलबदलुओं को टिकट देना और सामाजिक न्याय के मुद्दे को धार न दे पाना भी पार्टी के लिए नुकसानदेह साबित हुआ। नतीजों ने साफ कर दिया कि राहुल गांधी का ‘पार्ट-टाइम राजनीति’ वाला मॉडल जमीन पर असर नहीं छोड़ सका।

    सामाजिक न्याय और वोट चोरी अभियान का असर नहीं

    जैसे-जैसे नतीजे आते गए, दिल्ली से पटना तक पार्टी नेताओं ने स्वीकार किया कि सामाजिक न्याय और वोट चोरी अभियान जैसे मुद्दे जमीनी स्तर पर पकड़ नहीं बना पाए। पार्टी नेताओं के अनुसार, सामाजिक न्याय की राजनीति ने पार्टी के सीमित उच्च वर्गीय वोट बैंक को भी दूर कर दिया। वहीं एसआईआर और वोट चोरी अभियान को प्रिय मुद्दा बनाने के बावजूद, इनका प्रभाव वोटरों पर नहीं दिखा।

    दलबदलुओं को टिकट देने से बढ़ी नाराजगी

    कांग्रेस ने भाजपा, जदयू और लोजपा से आए कई नेताओं को टिकट थमा दिए। इससे स्थानीय स्तर पर व्यापक असंतोष पैदा हुआ। कई सीटों पर ऐसे उम्मीदवार उतारे गए जिनकी सोशल मीडिया प्रोफाइल पर भी अब तक एनडीए नेताओं के साथ तस्वीरें मौजूद थीं, जिससे विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हुए।

    रोजगार के मुद्दे को देर से उठाया

    आंतरिक समीक्षाओं के मुताबिक एसआईआर और वोट चोरी अभियान के कमजोर पड़ने के बाद कांग्रेस ने देर से रोजगार को मुख्य मुद्दा बनाया। तब तक जमीनी माहौल उसके पक्ष में नहीं बचा था।

    महिलाओं और ईबीसी वर्ग में पैठ नहीं बना पाई

    कांग्रेस पिछड़े और अति पिछड़े वर्ग को साधने में सफल नहीं रही। सवर्ण वोट बैंक भी पार्टी से कट गया। वहीं महिलाओं और ईबीसी के बीच नीतीश कुमार की योजनाओं का प्रभाव कांग्रेस आर-पार नहीं कर सकी। महागठबंधन एमवाई समीकरण से आगे बढ़ने में भी नाकाम रहा।

    अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन

    कांग्रेस ने बिहार में इस बार 8.73% मत हासिल किए, जो 2010 के प्रदर्शन के स्तर तक गिरावट है। पंडित जवाहरलाल नेहरू की जयंती पर आए नतीजों ने पार्टी के भविष्य की चुनौती और बढ़ा दी। प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय में सन्नाटा छाया रहा और सुबह से मौजूद नेता धीरे-धीरे चुपचाप निकल गए।

    1990 के बाद लगातार गिरावट

    कांग्रेस 1990 से अपनी खोई जमीन वापस पाने की कोशिश में है, लेकिन वोट प्रतिशत लगातार गिरता गया है।

    • 1985 में कांग्रेस का स्वर्णकाल था—39.3% वोट और 196 सीटें।
    • 1990 में 71 सीटें मिलीं, वोट प्रतिशत 24.78% रहा।
    • 1995 में 29 सीटें और 16.27% वोट।
    • 2000 में 23 सीटें और 11.6% वोट।
    • 2005 के मध्यावधि चुनाव में 10 सीटें और मात्र 5% वोट।
    • 2010 में केवल 4 सीटें—8.37% वोट।
    • 2015 में 27 सीटें—6.66% वोट।

    इस चुनाव ने कांग्रेस को बिहार की राजनीति के सबसे कमजोर मोड़ पर खड़ा कर दिया है।

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