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    October 02, 2025

    गुजरात हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी ,ईमानदारी पर एक सवाल और खत्म हो जाएगा जज का करियर

    गुजरात हाईकोर्ट ने एक अहम आदेश में कहा है कि किसी भी जज के पूरे सेवा रिकॉर्ड में अगर एक भी प्रतिकूल टिप्पणी दर्ज हो जाए, या उसकी ईमानदारी पर संदेह खड़ा हो, तो उसे अनिवार्य सेवानिवृत्ति दी जा सकती है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस तरह का कदम सार्वजनिक हित में उठाया जाता है और यह सजा नहीं माना जाएगा।

    अहमदाबाद में मंगलवार को सुनाए गए इस आदेश में हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति ए एस सुपेहिया और एल एस पिरजादा की खंडपीठ ने कहा कि न्यायपालिका पर जनता का भरोसा बनाए रखने के लिए जजों का चरित्र बिल्कुल साफ-सुथरा होना चाहिए। अदालत ने कहा कि जज के खिलाफ एक भी नकारात्मक टिप्पणी या ईमानदारी पर शक उसे अनिवार्य सेवानिवृत्त करने के लिए पर्याप्त है।

    इस मामले में की टिप्पणी
    यह आदेश उस समय आया जब एड-हॉक सत्र न्यायाधीश जे. के. आचार्य ने अपनी अनिवार्य सेवानिवृत्ति को चुनौती दी। उन्हें 2016 में 17 अन्य जजों के साथ रिटायर किया गया था। उस समय गुजरात हाईकोर्ट ने 50 और 55 वर्ष की उम्र वाले जजों का मूल्यांकन किया था और जिनका प्रदर्शन संतोषजनक नहीं पाया गया, उन्हें हटा दिया गया। आचार्य ने इसे राज्य सरकार और राज्यपाल की कार्रवाई के साथ कोर्ट में चुनौती दी थी, लेकिन उनकी याचिका खारिज कर दी गई।

    खंडपीठ ने अपने आदेश में यह भी कहा कि किसी जज को अनिवार्य सेवानिवृत्त करने के लिए कारण बताओ नोटिस जारी करना आवश्यक नहीं है। अदालत ने साफ किया कि यह प्रक्रिया प्रशासनिक निर्णय है, न कि अनुशासनात्मक सजा। अदालत ने यह भी कहा कि किसी जज को पदोन्नति या उच्च वेतनमान मिलना, अनिवार्य सेवानिवृत्ति के आदेश को प्रभावित नहीं कर सकता।

    सामान्य प्रतिष्ठा भी आधार
    हाईकोर्ट ने कहा कि जज को अनिवार्य सेवानिवृत्त करने के लिए ठोस सबूत होना जरूरी नहीं है। फुल कोर्ट उसकी सामान्य प्रतिष्ठा या ईमानदारी पर बनी धारणा के आधार पर भी फैसला कर सकती है। अदालत ने यह भी स्वीकार किया कि कई बार किसी जज की ईमानदारी पर सवाल साबित करने के लिए ठोस दस्तावेज जुटाना संभव नहीं होता, लेकिन सामूहिक रूप से ली गई राय ही पर्याप्त होती है।

    सुप्रीम कोर्ट का हवाला
    हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि जज का पद जनता के विश्वास से जुड़ा है। इसलिए उसके पास "निर्दोष छवि और उच्च नैतिक मूल्यों" का होना जरूरी है। अगर कोई जज इन मानकों से गिरता है तो हाईकोर्ट उस पर नजर रख सकता है और जरूरत पड़ने पर उसे अनिवार्य रूप से रिटायर कर सकता है। अदालत ने कहा कि लोकतंत्र और कानून के शासन को बनाए रखने के लिए न्यायपालिका की ईमानदारी पर कोई दाग नहीं लगना चाहिए।

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