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    November 21, 2025

    बंगाल में राजनीतिक तनाव बढ़ा, राज्यपाल-सरकार विवाद पर विपक्ष ने मांगी केंद्रीय हस्तक्षेप

    राष्ट्रपति द्वारा भेजे गए संदर्भ पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भले ही भारतीय संविधान में प्रयुक्त कई शब्द विभिन्न देशों के संवैधानिक ढांचे से प्रेरित हों, लेकिन उनकी व्याख्या और वास्तविक अर्थ पूरी तरह स्वदेशी हैं।

    पांच जजों की संविधान पीठ—सीजेआई जस्टिस बी.आर. गवई, जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस ए.एस. चंदुरकर—ने कहा कि भारत का संविधान लिखित है और इसलिए यह ब्रिटेन के अलिखित संविधान से भिन्न है। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि कार्यपालिका और विधायिका के बीच शक्तियों के सख्त बंटवारे के कारण अमेरिकी मॉडल का अनुभव भी भारतीय संदर्भ में अलग है।

    पीठ ने कहा, “भारतीय संविधान सिर्फ अपनाने में ही नहीं, बल्कि अपने इस्तेमाल और अर्थ की दृष्टि से भी समय के साथ विकसित होता आया है। यह अपनी औपनिवेशिक जड़ों को पीछे छोड़ते हुए एक जीवंत और स्वदेशी आधार तैयार कर रहा है।”

    दोबारा पारित विधेयक को भी राष्ट्रपति के विचार के लिए भेज सकते हैं राज्यपाल

    सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि विधानसभा कोई विधेयक बिना संशोधन या संशोधन के साथ दोबारा पारित कर राज्यपाल को भेजती है, तो राज्यपाल के पास उसे दूसरी बार भी राष्ट्रपति के विचार के लिए रिजर्व करने का अधिकार है।

    अनुच्छेद 200 का जिक्र करते हुए अदालत ने बताया कि पहली बार विधेयक आने पर राज्यपाल के पास तीन विकल्प होते हैं—

    • मंजूरी देना
    • राष्ट्रपति के विचार के लिए भेजना
    • बिल को विधानसभा को पुनर्विचार के लिए लौटाना

    लेकिन दूसरी बार आने पर राज्यपाल केवल दो विकल्पों का उपयोग कर सकते हैं—
    ✓ मंजूरी देना
    ✓ राष्ट्रपति के विचार के लिए भेजना

    राष्ट्रपति के विचार हेतु बिल भेजने में मंत्रिपरिषद की सलाह बाध्यकारी नहीं

    पीठ ने कहा कि अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल बिल को राष्ट्रपति के पास भेजने या टिप्पणियों के साथ विधानसभा को लौटाने में अपनी मर्जी का इस्तेमाल कर सकते हैं। इस प्रक्रिया में वह मंत्रिपरिषद की सलाह से बंधे नहीं हैं।

    साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि राज्यपाल के पास किसी बिल को अनिश्चित समय तक “लंबित रखने” का विकल्प नहीं है।

    33 लंबित विधेयकों पर समय सीमा तय करने से सुप्रीम कोर्ट का इनकार

    सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ कर दिया कि राज्यपाल और राष्ट्रपति पर लंबित विधेयकों के लिए समय-सीमा तय करना अदालत के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता।

    इन 33 लंबित विधेयकों में तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और पश्चिम बंगाल के अधिकांश बिल शामिल हैं।

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