कोटा के नांता क्षेत्र के बड़ा अखाड़ा में दशहरा के मौके पर अनोखी परंपरा निभाई गई। यहाँ रावण का वध दहन से नहीं बल्कि पहलवानों द्वारा कुश्ती कर पैरों से कुचलकर किया जाता है। यह परंपरा लगभग 150 साल पुरानी है और स्थानीय लोगों के लिए विशेष महत्व रखती है।
मिट्टी से बने रावण और मंदोदरी
अखाड़े के अध्यक्ष सोहन जेठी ने बताया कि जेठी समाज के लोगों ने अखाड़े की पवित्र मिट्टी से रावण और उसकी पत्नी मंदोदरी की प्रतिमा तैयार की। रावण की प्रतिमा तैयार करने में 7 दिन लगे और नवरात्र से एक दिन पहले पूरी तरह तैयार हो गई। मिट्टी में दूध, घी, शहद, दही और गेहूं मिलाकर उसे उपजाऊ बनाया गया ताकि उसमें ज्वार उग सके।
नवरात्र के दौरान आयोजन
नवरात्र के 9 दिन मंदिर के पट बंद रहते हैं और केवल पुजारी और व्यवस्थापक ही अंदर प्रवेश करते हैं। अखाड़े में इस दौरान रोजाना विशेष आयोजन होते हैं, जिसमें देवी के भजन गाए जाते हैं और देर रात तक गरबा खेला जाता है।
दशहरे के दिन रावण का वध
दशहरे की सुबह पहलवानों ने प्रतीकात्मक कुश्ती कर रावण और मंदोदरी की प्रतिमा को पैरों से कुचलकर नष्ट किया। इस दौरान जयकारों, ढोल-नगाड़ों और माता लिम्बा के जयघोष से माहौल युद्धभूमि जैसा बन गया। रावण की अहंकारी हंसी और आवाज भी माइक से सुनाई गई।
ज्वारों का वितरण और आशीर्वाद
वध के बाद बुजुर्ग समाज के लोग ज्वार का वितरण करते हैं। यह एकता और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। लोग बड़े-बूढ़ों से आशीर्वाद लेकर पूरे समुदाय में खुशहाली की कामना करते हैं।
इतिहास और राजपरिवार का योगदान
जेठी समाज मूलतः गुजराती ब्राह्मण हैं, जिन्हें पहलवानी का शौक था। लगभग 300 साल पहले गुजरात के कच्छ क्षेत्र से लोग कोटा आए थे। उस समय महाराजा उम्मेद सिंह उनके कुश्ती कौशल से प्रभावित होकर उन्हें यहीं बसने का आग्रह किया। तब से नांता और किशोरपुरा में अखाड़ों की स्थापना हुई, और यह परंपरा आज तक जारी है।
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